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जो मेरे पास नहीं वह में तुम्हें कैसे दे दूँ ? [कविता एकता खेतान]

February 01, 2020 1 Comments

जो मेरे पास नहीं वह में तुम्हें कैसे दे दूँ ?

सर्द रातों में जब तुम, रूठ के, मुँह फेर सो जाते हो,
तब तकियों के ओंट मे, में अपने टूटे मन को समेट रो जाती हूँ। 

गरमियों की तपती धूप में जिस छांव को तुम ढूँदते हो,
में भी उस छांव को तरस जाती हूँ।

बारिशों में जो छत ना बन सके,
सिर पे रहके भी रिसता रहे, 
उन दीवारों पे भी में आस की तस्वीरें लगती हूँ।

टूटी, टेढ़ी सड़कों पर,
पानी से भरे गड्ढों में, 
में अपनी काग़ज़ की ही सही, नाव चलाती हूँ।

इन बारिशों, सर्दियों और ग्रीष्म में मैंने क्या पाया है? 
हाँ पर इन सभी मौसमों ने मेरे अंदर एक चाह जगाया है। 

आएगा बसंत यह सोच कर,
जलाए मैंने कई आशाओं के दिए।
होगी एक चमकदार सुबह कल
यह सोच कर मैंने कई रात, अंधेरो में ख़ाली कर दिए।
सुबह आए ना आए, रातों में दिया जलाना भी ज़रूरी है।
तमस से भरे मन को, में बिना रोशनी कैसे प्रज्वलित कर दूँ ?

जो मेरे पास नहीं वह में तुम्हें कैसे दे दूँ ?
---© एकता खेतान कृति---


The autor is half Human, half machine. Go Figure or just revel in what I write

1 comment:

  1. Bahut khubsurat, kisi k bhi dil ki baat hai ye 👏👏

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Hi Folks,

You heard me...now its time for Bouquets and Brickbats!

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