Aurat Ka koi Ghar Nahi Hota औरत का कोई घर नहीं होता

औरत का अपना कोई घर नहीं,

मगर ज़िम्मेदारी उसकी ऊँची साझा है।

उसकी अपनी इज़्ज़त का कोई लिहाज़ हो ना हो,

दूसरों की इज़्ज़तों की जवाबदारी 

उसके हाथ का माँजा है। 

।।

जिस आँगन में जनम ले,

उसी मायके में पराया धन कहलाए।

कभी भाभी तो कभी भई के 

तानो में अपना सिर हिलाए।

शादी के नाम पर 

कन्फ़र्म हो जाता है देश निकाला।

फेरो में करके कन्यादान,

धन से अब उसे,

कोई वस्तु बना डाला।

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बरसो "अपने घर" के सपने संजोए 

जब ससुराल में जाए 

स्नेह और अपनेपन के नाम पे 

 ख़ाली ज़िम्मेदारी ही पाए ।


दान की हुई वस्तु का क्या मोल है?

"तुम्हारी बीवी, आपकी बेटी,"

इस मापदंड पर ही उसका तोल है। 

दिन भर सुई की नोक पे 

जाँची जाती, परखी पाती।

 पति की उँगलियों पे नाचती, 

सास की रोक-टोक पे,

कलाबाज़ियाँ खाती।

सबको खुश करने में जाने कब उमर बीत जाती है 

मगर अक्सर बहू, बेटी नहीं बनाई जाती है। 

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पिता के चोखट से लेकर,

पिया के घर तक

औरत का अपना मकान,

या अपना मुक़ाम,

बस उतना में सिमट जाता है।

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औरत का कोई घर नहीं होता 

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NumeroUnity 

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