मक़सद नया
है वो तनहा बेज़ार
जिसकी ज़िंदगी बेमक़सद, बेकार
उम्मीदों की राहों को कर सियाह,
बन जा काबिल,
ढूँढ ले कोई मक़सद नया ।
या तो बन जा सूरज,
ढलते हुए भी चमचमा
या फिर रात को उजाला कर,
संग तारो के टिमटिमा।
ख़ाली पड़ी ज़मीन बंजर बन जाती है।
चलते हुए रास्तों पे खरपतवार कहा आती है?
या तो सड़क बन के, राह दिखा,
मुसाफिर को मंजिल तक पग लगा।
या फिर खेत बन, फसलों से लहलहा।
क्यों बैठा है, नाउम्मीद, हाथ फैला?
जीवन हैं खूबसूरत,
इसे साजो -सजा,ना बना कोई सजा।।
बीती सारी बिसार के,
ढूँढ ले कोई मक़सद नया ।
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Hi Folks,
You heard me...now its time for Bouquets and Brickbats!